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वायग्रा का इस्तेमाल न सिर्फ यौन शक्ति के लिए अच्छा है बल्कि उसका संबंध पुरुषों की लंबी जिंदगी से भी जोड़ा जा सकता है. नई रिसर्च में पाया गया कि जिन पुरुषों ने हार्ट अटैक के बाद छोटी गोली का इस्तेमाल किया, उनको दोबारा हार्ट अटैक का खतरा कम हो गया.

स्वीडिश रिसर्च के मुताबिक, यौन शक्ति बढ़ानेवाली वायग्रा की गोली हार्ट अटैक और दिल संबंधी पेचीदगी के खतरे को कम कर सकती है. दावा है कि नपुसंकता की दवा सिल्डेनाफिल हार्ट अटैक के जोखिम को कम कर पहले से दिल की बीमारी वाले पुरुषों के जीवन काल को बढ़ाती है. कारोलिन्सका इंस्टीट्यूट के रिसर्च को जर्नल ऑफ अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियालॉजी में प्रकाशित किया गया है.

क्या वयाग्रा के इस्तेमाल से दोबारा हार्ट अटैक का खतरा होता है कम?

अग्रणी वैज्ञानिक एंड्रयू ट्राफोर्ड ने डेली एक्सप्रेस को बताया कि खोज ‘अविश्वसनीय रूप से उत्साहजनक’ हैं. वैज्ञानिकों ने कोरोनरी आर्टरी डिजीज वाले 18,500 पुरुषों का विश्लेषण किया जो नपुसंकता का इलाज करवा रहे थे. उनमें से 16,500 वायग्रा का इस्तेमाल कर रहे थे जबकि 2,000 पुरुष नपुसंकता का इलाज करनेवाली अन्य दवा सिल्डेनाफिल सिरींज से ले रहे थे. रिसर्च से पता चला कि नियमित वायग्रा का सेवन करनेवाले पुरुषों को हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर, बाइपास सर्जरी का खतरा सिल्डेनाफिल लेनेवालों के मुकाबले कम हुआ, जिससे उनकी जिंदगी लंबी होने में मदद मिली.

गोली दिल की बीमारी के खतरे को कम कर बढ़ाती है उम्र- रिसर्च

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन का कहना है कि किसी स्वस्थ पुरुष में नपुसंकता की समस्या दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है. इलाज का अन्य विकल्प PDE5 इन्हिबिटर्स नामक दवा का वर्ग जैसे वयाग्रा  (सिल्डेनाफिल) या सियालिस (टाडालाफिल) है, जिसे टैबलेट के तौर पर मुंह से खाया जाता है. ये दवाइयां रक्त प्रवाह को बढ़ाने के लिए PDE5 एन्जाइम को रोकने का काम करती हैं. शोधकर्ताओं ने जानने की कोशिश की कि नपुंसकता के इलाज में इस्तेमाल होनेवाली इन दवाइयों का कोरोनरी आर्टरी डिजीज के मरीजों पर कैसा प्रभाव पड़ता है.

नपुंसकता का इलाज शुरू करने से छह महीने पहले प्रतिभागियों को हार्ट अटैक, बलून डाइलेशन या बाइपास सर्जरी का अनुभव हो चुका था. डॉक्टरों का कहना है कि दोबारा हार्ट अटैक का खतरा पहले छह महीनों में सबसे ज्यादा होता है. नतीजे बताते हैं कि इस बात की संभावना है कि  PDE5 इन्हिबिटर्स इस्तेमाल करनेवाले एल्प्रोस्टाडील लेनेवालों की तुलना में ज्यादा स्वस्थ थे और इसलिए उनको कम खतरा था. हालांकि, खोज के नतीजों की पुष्टि के लिए ज्यादा रिसर्च किए जाने की भी बात कही गई है.

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