Nirmala Sitharaman


नई दिल्ली: संसद में आर्थिक सर्वे पेश किया जा चुका है. इस दौरान कहा गया कि वैश्चिक रेटिंग एजेंसियों के जरिए तय की जाने वाली भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती को नहीं दर्शाती है. सर्वे में रेटिंग एजेंसियों को सलाह दी गई है कि वे भारत की वित्तीय साख का स्तर व्यक्तिपरक की जगह पारदर्शी तरीके से करें.

सर्वे में कहा गया है कि सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग के तरीके में बदलाव किया जाना चाहिए और इसमें अर्थव्यवस्था की अपनी ऋण प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की क्षमता और इच्छा को दर्शाया जाना चाहिए. समीक्षा दस्तावेज में कहा गया है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग के तरीके में बदलाव के लिए एक-साथ आना चाहिए.

मजबूत बुनियाद को नहीं दर्शाती

सर्वे में कहा गया है, ‘सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जबकि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को निवेश ग्रेड (बीबीबी-/बीएए3) की रेटिंग दी गई है. सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद को नहीं दर्शाती है लेकिन अस्पष्ट और पक्षपातपूर्ण क्रेडिट रेटिंग से देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफपीआई) के प्रवाह को नुकसान पहुंचता है.’

आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि विभिन्न देश क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से उनके रेटिंग प्रदान करने के तरीके में सुधार को लेकर बातचीत करें. रेटिंग से किसी अर्थव्यवस्था की अपनी विदेशी कर्ज प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की क्षमता और इच्छा का संकेत मिलना चाहिए. इसमें कहा गया है कि रेटिंग में भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद पर ध्यान नहीं दिए जाने से पहले देश की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग में बदलावों का चुनिंदा सेंसेक्स, विदेशी विनिमय दर और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के प्रतिफल असर नहीं दिखे हैं.

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